Tuesday, January 1, 2019

बांसवाड़ा में अरथूना-माही महोत्सव की धूम 7 जनवरी से

तीन दिनों तक बिखरेंगे लोक संस्कृति के रंग  

बाँसवाड़ा, 1 जनवरी/ कला-संस्कृति और ऐतिहासिक-सांस्कृतिक विरासत के साथ नैसर्गिक सौंदर्यश्री को अपने आंचल में समाहित करने वाले बांसवाड़ा जिले को विश्व पर्यटन मानचित्र पर स्थापित करने के लिए आगामी 7 से 9 जनवरी, 2019 को अरथूना-माही महोत्सव का आयोजन किया जाएगा। 
जिला कलक्टर आशीष गुप्ता ने बताया कि जनजाति क्षेत्रीय विकास, पर्यटन और वन विभाग के साथ-साथ गोविंद गुरु जनजातीय विश्वविद्यालय के सहयोग से आयोजित होने वाले इस तीन दिवसीय महोत्सव के ख्यातनाम शास्त्रीय और लोककलाकारों की प्रस्तुतियों के माध्यम से स्तरीय रंगारंग सांस्कृतिक आयोजन होंगे। इन महोत्सव  के भव्य व सफल आयोजन के लिए जिला प्रशासन और जिला पर्यटन उन्नयन समिति द्वारा तैयारियां प्रारंभ कर दी गई हैं और संबंधित विभागों को इसके लिए अपेक्षित व्यवस्थाएं सुनिश्चित करने के निर्देश दिए जा रहे हैं। 
राज्यमंत्री बामनिया 7 जनवरी को करेंगे रंगारंग शुरूआत: 
जिला कलक्टर गुप्ता ने बताया कि जिले की नैसर्गिंक संपदा, कला, संस्कृति के सौंदर्य को देश-दुनिया तक पहुंचाने की दृष्टि से पहली बार डिजीटल फोटो व विडियो प्रदर्शनी का आयोजन किया जा रहा है। यह प्रदर्शनी सूचना केन्द्र में 7 जनवरी को शुरू होगी। प्रदेश के जनजाति क्षेत्रीय विकास (स्वतंत्र प्रभार), उद्योग एवं राजकीय उपक्रम विभाग के राज्यमंत्री श्री अर्जुनसिंह बामनिया के मुख्य आतिथ्य में इस प्रदर्शनी के शुभारंभ के साथ महोत्सव की शुरूआत होगी। प्रदर्शनी सुबह 11 बजे प्रारंभ होगी और इसमें जिले की नैसर्गिंक संपदा, प्राचीन शिल्पसौंदर्य और पर्यटन स्थलों के फोटो-विडियो को एलईडी टीवी के माध्यम से प्रदर्शित किया जाएगा। यह प्रदर्शनी तीन दिनों तक जनसामान्य के अवलोकन के लिए खुली रहेगी। 
कोणार्क फेस्टिवल की तर्ज पर होगा ‘अरथूना महोत्सव’: 
कलक्टर गुप्ता ने बताया कि महोत्सव के तहत 7 जनवरी की शाम दसवीं शताब्दी के पुरातात्विक महत्ता वाले जिले के सबसे महत्त्वपूर्ण और प्राचीन स्थल अरथूना में शास्त्रीय गीत-संगीत व नृत्यों की प्रस्तुतियां दी जाएगी। महोत्सव के दौरान अरथुना में रात्रि में कोणार्क फेस्टिवल की तर्ज पर प्राचीन मंदिरों पर विशेष रंगीन रोशनी की जाएगी तथा मंदिरों को आकर्षक तरीके से सजाया जाएगा। इन मंदिरों के आगे आकर्षक शास्त्रीय संगीत व नृत्यों की प्रस्तुतियां दी जाएंगी, इसके लिए देश के ख्यातनाम शास्त्रीय कलाकारों से संपर्क किया जा रहा है।  
जीजीटीयू करवाएगा बांसवाड़ा बर्डफेस्टिवल:   
कलक्टर गुप्ता ने बताया कि 8 जनवरी को कूपड़ा तालाब पर आयोजित होने वाले एक दिवसीय बांसवाड़ा बर्डफेस्टिवल के आयोजन की जिम्मेदारी गोविन्द गुरु जनजातीय विश्वविद्यालय को दी गई है। बर्ड फेस्टिवल के आयोजन में देश-प्रदेश के बर्डवॉचर्स, बर्ड एक्सपर्ट्स के साथ शहर के समस्त निजी व सरकारी स्कूलों के लगभग 1 हजार विद्यार्थियों को बर्डवॉचिंग कराई जाएगी। इस मौके पर पूर्व की भांति क्विज एवं पेंटिंग प्रतियोगिता, फेस (टेटू) पेंटिंग, बर्ड्स की फोटो एवं स्टाम्प प्रदर्शनी के साथ तितलियों के जीवनचक्र की लाईव प्रदर्शनी का भी आयोजन किया जाएगा।  
कागदी पिक-अप-वियर का होगा प्रमोशन: 
कलक्टर ने बताया कि शहरवासियों को स्थानीय नैसर्गिक संपदा और संस्कृति से जोड़ने की दृष्टि से कागदी पिक-अप-वियर का प्रमोशन किया जा रहा है। इस बार फेस्टिवल के तहत 8 जनवरी की रात्रि इस आकर्षक उद्यान पर आकर्षक रोशनी की जाएगी तथा यहां पर मुक्ताकाशी रंगमंच स्थापित करते हुए लोक कलाकारों की प्रस्तुतियां दी जाएंगी। 
ये आयोजन भी होंगे: 
कलक्टर ने बताया कि महोत्सव के प्रति वातावरण निर्माण के लिए 6 जनवरी को शहर में एक बाईक रैली का आयोजन किया जाएगा वहीं 9 जनवरी को गेमन पुल पर नौकायन प्रतियोगिता का आयोजन किया जाएगा इसमें नौकाओं को आकर्षक ढंग से सजाया जाएगा और सर्वश्रेष्ठ नोकाचालक तथा रंगारंग नौका को पुरस्कृत भी किया जाएगा।  
भव्य सांस्कृतिक निशा से होगा समापन: 
कलक्टर ने बताया कि अरथूना-माही महोत्सव का समापन कुशलबाग मैदान में 9 जनवरी की रात्रि को भव्य सांस्कृतिक निशा के माध्यम से होगा। इसमें देश-प्रदेश के ख्यातनाम लोक कलाकारों के साथ वागड़ में होली के प्रतिनिधि गैर नृत्य की प्रस्तुतियां लोगों का मन मोह लेंगी। इस आयोजन में रंगीन रोशनी विशेष आकर्षण का केन्द्र रहेगी। इस समस्त आयोजनों के लिए कलक्टर ने 2 जनवरी को जिले के संबंधित विभागीय अधिकारियों की बैठक आहूत की है। 
अरथूना-माही फेस्टिवल का लोगो








Saturday, December 29, 2018

वागड़ के पुराने शिल्प-स्थापत्य से रूबरू हुए नए कलेक्टर

समृद्ध इतिहास व शिल्प वैभव को विश्वमानचित्र पर स्थापित करने की जरूरत बताई
कलक्टर ने कहा - राजस्थान का हम्पी है अर्थूना
बांसवाड़ा, 29 दिसम्बर/ क्षेत्रीय भ्रमण पर निकले जिला कलक्टर आशीष गुप्ता ने शनिवार को जिले में दसवीं शताब्दी के परमारकालीन शिल्प-स्थापत्य को अपने आंचल में समाहित करने वाले अर्थूना मंदिर समूह को देखा और इसके शिल्प-वैशिष्ट्य की सराहना करते हुए इसे कर्नाटक में स्थित यूनेस्को की वर्डहेरिटेज हंपी जैसा बताया और कहा कि विश्वास ही नहीं होता कि इस प्रकार का समृद्ध शिल्प वैभव बाँसवाड़ा में विद्यमान है। 
आज दोपहर यहां पहुंचे कलक्टर ने सर्वप्रथम हनुमान मंदिर परिसर को देखा तथा इसके बाद वे प्राचीनता शिव पंचायतन मंदिर पहुंचे। उन्होंने यहा शिवालय के गर्भगृह में स्थित शिवविग्रह के दर्शन किए और शिवालय के प्रस्तर शिल्प-सौंदर्य की सराहना की। उन्होंने इसे इस अंचल की अमूल्य धरोहर बताया। कलक्टर ने मंदिर परिसर और जहां-तहा पड़े मूल्यवान शिल्पाकृतियों का सुव्यवस्थित तरीके से किसी संग्रहालय में स्थापित करवाने की अपनी मंशा भी जाहिर की और कहा कि इस बारे में पुरातत्व विभागीय अधिकारियों से संपर्क किया जाएगा। इस दौरान उन्हें पर्यटन उन्नयन समिति संरक्षक जगमालसिंह व ग्रामीणों ने यहां पर मंदिर समूह के स्थापित होने की किंवदंती के बारे में भी बताया गया। कलक्टर ने यहां म्यूज़ियम को भी देखा और इसमें सुरक्षित रखे शिल्पाकृतियों को बेशकिमती बताया।  
कलक्टर ने यहां मंदिर के पीछे स्थित तालाब में सारस क्रेन के एक जोड़े को देखकर भी प्रसन्नता जताई। उन्होंने इस तालाब के भी संरक्षण की बात कही तथा कहा कि अर्थूना मंदिर समूहों तक पर्यटकों को लाने के लिए प्रयास किए जाएंगे।  
अरथूना महोत्सव की व्यवस्थाओं पर भी हुई चर्चा:
कलक्टर ने इस दौरान अरथूना फेस्टिवल के तहत होने वाले कार्यक्रमों के बारे में भी पर्यटन उन्नयन समिति संरक्षक जगमालसिंह व नितीन समाधिया से चर्चा की। उन्होंने कहा कि इस बार भी पूरे उत्साह के साथ यह महोत्सव आयोजित किया जाएगा।  इस मौके पर डीएफ़ओ सुगनाराम जाट, एसडीओ प्रभुदयाल शर्मा, विकास अधिकारी राजेश कुमार वर्मा भी मौजूद थे।

अरथूना मंदिर समूह का निरीक्षण करते कलक्टर आशीष गुप्ता।











जिले की प्राकृतिक व सांस्कृतिक संपदा देख अभिभूत हुए कलक्टर

: नए कलक्टर का जिले का पहला दौरा :
कहा- विश्वास ही नहीं होता कि ये भी है बाँसवाड़ा
बांसवाड़ा, 29 दिसम्बर/नवपदस्थापन स्थान बांसवाड़ा में कार्यभार ग्रहण करने के बाद जिला कलक्टर आशीष गुप्ता शनिवार को अवकाश के दिन क्षेत्रीय भ्रमण पर निकले और इस दौरान बांसवाड़ा से लेकर अरथूना तक का सघन दौरा कर जिले में सरकारी व्यवस्थाओं के साथ प्राकृतिक व सांस्कृतिक स्थलों का जायजा लिया। 
लोधा तालाब को देख जताई चिंता, जलकुंभी का निकालेंगे स्थायी समाधान: 
आज अल सुबह ही क्षेत्रीय भ्रमण पर निकले कलक्टर गुप्ता ने लोधा तालाब को देखा और इसकी दुर्दशा को देख चिंता जताई। उन्होंने तालाब के किनारों पर पसरी गंदगी और पानी से लबालब भरे पूरे तालाब में जलकुंभी का साम्राज्य देखकर विचलित हो उठे। उप वन संरक्षक सुगनाराम जाट और जिला पर्यटन उन्नयन समिति संरक्षक जगमालसिंह ने तालाब में पूर्व वर्षों में करवाई गई सफाई के निरंतर नहीं होने से इसमें पुनः जलकुंभी के पनप जाने के तथ्य को भी बताया। कलक्टर ने कहा कि सड़क किनारे स्थित ऐसे जैव विविधता समृद्ध तालाबों की सफाई जरूरी है। उन्होंने जलकुंभी के स्थाई इलाज करवाने की भी बात कही और कहा कि जलकुंभी के हेण्डीक्राफ्ट  या बेत फर्नीचर निर्माण में उपयोग की संभावनाएं तलाशी जाएंगी तथा इसके लिए जिला उद्योग केन्द्र, राजीविका मिशन इत्यादि विभागीय अधिकारियों के साथ बैठक कर कार्ययोजना तैयार की जाएगी। 
बर्डफेयर साईट पर पहुंचे कलक्टर, कहा-इतने सुंदर पक्षी तो आज तक नहीं देखे: 
लोधा तालाब के निरीक्षण उपरांत जिला कलक्टर गुप्ता ने कूपड़ा तालाब स्थित बर्डफेयर साईट का निरीक्षण किया। उन्होंने साफ-सुथरे पानी में हजारों की संख्या में स्थानीय और प्रवासी पक्षियों की उपस्थिति को देखकर ख़ुशी जताई। कलक्टर स्वयं ने बायनोकूलर की सहायता से शॉवलर, स्पॉट बिल डक, पोचार्ड, जैकाना, परपल मुरहैन आदि पक्षियों को देखा और इनके रंगों के सौंदर्य को देख अभिभूत हो उठे। उन्होंने कहा कि उन्होंने पक्षियों के इतने सुंदर रंग कभी नहीं देखे। कलक्टर ने यहां पर प्रस्तावित बांसवाड़ा बर्ड फेस्टिवल के बारे में फेस्टिवल संयोजक व जनसंपर्क उपनिदेशक कमलेश शर्मा से तैयारियों की जानकारी ली। उन्होंने ग्राम पंचायत के माध्यम से बर्डफेयर साईट की व्यापक सफाई के निर्देश दिए तथा कहा कि पक्षियों की अनुकूलता को देखते हुए तालाब में पानी की प्रचुर मात्रा हमेशा मौजूद रहे यह सुनिश्चित किया जावे। कलक्टर ने इस बार भव्य तरीक़े से हो बर्डफेयर के आयोजन के निर्देश देते हुए कहा कि वे जल्द ही इस तालाब का दोबारा निरीक्षण करेंगे। इस दौरान उप वन संरक्षक सुगनाराम जाट ने कूपड़ा तालाब सहित जिले के 16 जलाशयों पर 5 जनवरी से प्रारंभ हो रही जलीय पक्षीगणना के बारे में जानकारी दी तो उत्साहित कलक्टर ने स्वयं इस पक्षीगणना दौरान उपस्थित रहने की बात कही। इस दौरान कलक्टर ने पर्यटन उन्नयन समिति संरक्षक जगमालसिंह, वाइल्डलाइफ़ फ़ोटोग्राफ़र भरत कंसारा और न्यू लुक कॉलेज के सुशील सोमपुरा से बर्डफेस्टिवल की गतिविधियों और इसमें ग्रामीणों व संस्थाओं की सहभागिता के बारे में जानकारी ली।
जिला कलक्टर आशीष गुप्ता शनिवार को लोधा तालाब का निरीक्षण करते हुए।



बर्डफेयर साईट कूपड़ा तालाब पर बर्डवॉचिंग करते जिला कलक्टर आशीष गुप्ता। 

Thursday, February 18, 2016

जन-मन में प्राण फूंकती ‘वागड़ गंगा माही’







श्रद्धा और कृतज्ञता दर्शाने का पर्व है ‘माही महोत्सव’

- कमलेश शर्मा

    प्रज्ञा उर्वरा वागड़ भूमि को सस्य स्यामल और समृद्धि से संपृक्त बनाने का एकमात्र श्रेय जाता है ‘वागड़ गंगा माही’ को। मध्यप्रदेश के अमरकंटक पर्वत से आविर्भूत होकर यह सदानीरा अपनी नहरों रूपी धमनियों से बांसवाड़ा जिले के एक बड़े क्षेत्र तक अमृत का संचार करती है और जन-मन में प्राण फूंकने वाली ‘माही’ की हरेक बूंद इस अंचल के रहवासियों में रक्त बनकर इसकी जयगाथा को बखानती प्रतीत हो रही है। इस अंचल के जन-जन के चेहरे का तेज, दिल की धड़कन, मन का उल्लास  और बाजुओं का दमखम सिर्फ और सिर्फ माही की ही देन है। विकास और उल्लास की इसी देन पर कृतज्ञ अंचल द्वारा ‘माही मैया’ के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का पर्व है ‘माही महोत्सव’, और अगले दो दिनों में संपूर्ण बांसवाड़ा जिला इसी लोकोत्सव के रंगों में रंगा नज़र आएगा। इस दौरान धरा से आसमां तक दिखेगी उल्लसित जनगंगा के मन से उठती तरंगे और श्रद्धा उमड़ाता खुशी का महासागर। 

    पौराणिक संदर्भों में भी पुण्यदायी है ‘माही मैया’: 

    माही नदी का उल्लेख पुराणों में भी किया गया है । स्कन्द पुराण के कुमारिका खण्ड में इस बात का उल्लेख है कि इन्द्रद्युम्न नामक राजा द्वारा विध्याचल के अमरकंटक पर्वतश्रेणी स्थान पर किए गए यज्ञ की अग्नि से तप्त धरा से निस्सृत जलधारा ही माही नदी है। इस तरह विध्याचल के अमरकंटक पर्वतश्रेणी से आमझरा नामक स्थान से माही नदी का उद्गम माना जाता है और यह नदी विध्याचल से 120 किलोमीटर बहने के बाद बांसवाड़ा जिले में प्रवेश करती है तथा डूंगरपुर होकर गुजरात में बहती हुई अरब सागर में मिल जाती है। पौराणिक संदर्भों में बताया गया है कि इस नदी के जल में स्नान करने से पुण्यार्जन होता है और यही कारण है कि इसे वागड़ के जाये जन्मे ‘महीसागर’ तीर्थ की संज्ञा देते है व इसका स्नान-ध्यान करते हुए इसके प्रति अगाध आस्थाओं को प्रदर्शित करते हैं।  

    बांध क्षीरसागर, नीर अमृत और नहरें बनी है धमनियां: 

    मध्यप्रदेश और प्रतापगढ़ से आती अथाह जलराशि बहकर समुद्र में व्यर्थ ही चली जाती गर इस पर माही बांध का निर्माण न हुआ होता। वागड़ अंचल के विकास के पुरोधा पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय हरिदेव जोशी के प्रयासों से अस्तित्व में आया माही बांध इस अंचल के निवासियों के मन में सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु का शयनस्थल स्वरूप क्षीरसागर की प्रतिकृति के रूप में स्थान बनाए हुए है। इस बांध में संग्रहित जल की एक-एक बूंद अमृतकण के समान है जो इस अंचल की भूमि को सिंचित कर जन-मन में प्राण फूंकने का उपक्रम कर रही है। जिस तरह मानव शरीर में शिराएं रक्त को शरीर के विभिन्न भागों तक पहुंचाकर जीवन का संचार करती है उसी तरह माही बांध की नहरें भी यहां के दूरस्थ ग्राम्यांचलों के खेतों तक पानी का संचार कर मानव जीवन का आधार बनी हुई हैं।  

    माही बजाज सागर परियोजना:  

    माहीडेम या माही बजाज सागर परियोजना के कारण ही आज वागड़ अंचल सरसब्ज है। स्वाधीनता सेनानी स्व. श्री जमनालाल बजाज की पुण्य स्मृति में इस बांध का नामकरण ‘माही बजाज सागर’ किया गया है । वागड़ अंचल की जीवनरेखा बनी माही बजाजसागर परियोजना एक बहुउद्देशीय परियोजना है और इस परियोजना से सिंचाई हेतु जल प्रवाह का शुभारम्भ तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी के कर कमलों द्वारा 1 नवम्बर, 1983 को किया गया था। माही नदी के जल उपयोग हेतु गुजरात एवं राजस्थान राज्यों के मध्य निष्पादित वर्ष 1966 के अनुबन्ध के अन्तर्गत माही बजाजसागर परियोजना का निर्माण किया गया है। मुख्य बांध की कुल भराव क्षमता 77 टीएमसी है एवं उपयोगी भराव क्षमता 60.45 टीएमसी है। अनुबंध के अनुसार बांध में संग्रहित उपयोगी जल में से 40 टीएमसी जल गुजरात राज्य एवं 16 टीएमसी जल राजस्थान राजय के उपयोग हेतु निर्धारित किया गया है। बांध का निर्माण गुजरात व राजस्थान के सहयोग से किया गया है। मुख्य बांध एवं सम्बन्धित निर्माण कार्यों की लागत में अनुबन्ध के अन्तर्गत गुजरात एवं राजस्थान का आर्थिक सहयोग 55ः45 प्रतिशत है।

    55 वर्ष पहले हुआ था शिलान्यास: 

     इस परियोजना का शिलान्यास वर्ष 1960 में किया गया था परंतु परियोजना का प्रारम्भिक निर्माण कार्य योजना आयोग द्वारा नवम्बर, 1971 में रुपये 31.36 करोड़ की स्वीकृति प्राप्त होने पर प्रारम्भ किया गया। प्रारम्भ में स्वीकृत योजना से सिंचाई सुविधा 44,170 हैक्टेयर भूमि में देने का प्रावधान था, जिसे बढ़ाकर वर्ष 1974-75 में 80,000 हैक्टेयर किया गया था एवं 140 मेगावाट विद्युत क्षमता के दो विद्युतगृहों के निर्माण का प्रावधान रखा गया। पुनः वर्ष 1984-85 में कमाण्ड क्षेत्र को 80,000 हैक्टेयर से विस्तारित कर 1,23,500 हैक्टेयर करते हुए इसमें बांसवाड़ा जिले की आनन्दपुरी, भूंगड़ा, जगपुरा एवं डूंगरपुर जिले की माही सागवाड़ा नहर को सम्मिलित किया गया, परन्तु केन्द्रीय जल आयोग द्वारा मई, 2002 में 80,000 हैटेयर कमाण्ड क्षेत्र के लिए स्वीकृति प्रदान की गई, जिसमें माही सागवाड़ा नहर के 0 से 8 किमी. तक के भाग एवं निठाउवा वितरिका को सम्मिलित किया गया।
    माही परियोजना का निर्माण तीन इकाईयों में किया गया था।  प्रथम इकाई के अन्तर्गत 435 मीटर लम्बे एवं अधिकतम 74.5 मीटर ऊंचे चुनाई एवं कंकरीट बांध का निर्माण किया गया है एवं दांये तथा बांये किनारों पर 2,674 मीटर लम्बा मिट्टी के बांध का निर्माण किया गया है, जिसकी अधिकतम ऊंचाई 43 मीटर है। द्वितीय इकाई में नहरों एवं वितरण प्रणाली के तहत मुख्य बांध की परिधि पर स्थित विद्युतगृह-प्रथम के द्वारा सिंचाई हेतु जल कागदी पिकअप वियर से निकलने वाली दांई व बांई मुख्य नहर तक पहुंचाने से संबंधित निर्माण का हुआ। दांई मुख्य नहर एवं इसकी वितरण शाखा नहरें क्रमशः 71.72 किमी. एवं 977.50 किमी. लम्बी हैं वहीं दांई मुख्य नहर एवं इसकी वितरण शाखा नहरों की लम्बाई क्रमशः 36.12 किमी. एवं 1028 किमी. हैं। बांध के कुल 77 टी.एम.सी. पानी मंे से 64 टी.एम.सी. पानी का उपभोग सामान्यतः सिंचाई के लिए किया जा रहा हैै और इससे ही दोनों जिलों के खेतों की प्यास बुझकर रिकार्ड अन्न उत्पादन हो रहा है। 

    पन बिजलीघरों का भी हुआ निर्माण: 

    माही परियोजना के निर्माण की तृतीय इकाई में विद्युत गृह एवं सम्बन्धित कार्य संपादित किए गए। इसके तहत मुख्य बांध की परिधि पर सैडल बांध नम्बर-5 पर स्थित सतही विद्युत गृह प्रथम एवं ग्राम लीलवानी के समीप सतही विद्युत  गृह द्वितीय का निर्माण किया गया है। इस इकाई के अन्तर्गत विद्युत गृह प्रथम से प्राप्त जल को सिंचाई हेतु कागदी पिकअप वियर तक पहुंचाने के लिए 1462 मीटर लम्बी सुरंग एवं 3090 मीटर लम्बी नहर का निर्माण किया गया है।  विद्युत गृह-प्रथम का निर्माण कार्य मई 1978 में प्रारम्भ हुआ था तथा इसकी कुल लागत 68 करोड़ रूपये है । विद्युत गृह -द्वितीय पर 1989 में ऊर्जा उत्पादन आरम्भ हुआ तथा उसकी लागत 120 करोड़ रूपये है ।  यह राजस्थान का पहला स्वदेशी मशीनों द्वारा निर्मित पन बिजली घर है । पावर हाउस-प्रथम पर 25 मेगावाट की 2 मशीनें है, तथा उनकी कुल क्षमता 50 मेगावाट है । पावर हाउस-द्वितीय, बागीदौरा पर 2 मशीनें हैं,तथा उनकी कुल क्षमता  90 मेगावाट है । इस प्रकार माही हाईडल प्रोजेक्ट की कुल क्षमता 140 मेगावाट है । पावर हाउस-प्रथम का राष्ट्र को समर्पण 13 फरवरी 1986 को तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री हरिदेव जोशी के कर कमलों से हुआ था ।  माही बांध की बदौलत बांसवाड़ा जिला रिकार्ड बिजली उत्पादन करने वाला जिला भी बना है और अब तक माही के पानी के उपयोग के माध्यम से जिले के स्थापित दोनों जल विद्युत गृहों से करोड़ यूनिट बिजली का उत्पादन हुआ है। 
निश्चय ही माही मैया इस अंचल की जीवनरेखा के रूप जहां सिंचाई के लिए पर्याप्त जलराशि मुहैया करवा रही है वहीं बिजली उत्पादन के रूप में भी आम जनजीवन को रोशन करने का उदात्त उपक्रम कर रही है। माही मैया के इसी उपक्रम को स्मरण करने के पुण्य पर्व माही महोत्सव के शुभ मौके पर समूचे वागड़ अंचल को बधाई व शुभकामनाएं। 
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कमलेश शर्मा 
सहायक निदेशक, 
सूचना एवं जनसंपर्क विभाग डूंगरपुर
मोबाईल 9414111123
  फोटो - 
01: माही बांध का निर्माणाधीन कार्य । 
02: निर्माणाधीन माही बांध पर कार्यरत श्रमिक।  
03-06: निर्माणाधीन माही बांध।   
07 तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री शिवचरण माथुर 20 सितंबर 1984 को विद्युत परियोजना की स्थापना अवसर पर । 
 08: गेमन पुल पर स्थित मंदिर में माही मैया की प्रतिमा। 
09: माही बांध से निकलने वाली जलराशि।
10: माही बांध का विहंगम दृश्य। 
11. माही बांध का चाचाकोटा स्थित बेकवाटर व पसरी हरियाली का विहंगम दृश्य।
12. माही बांध के बैकवाटर में हरितिमायुक्त टापू। 
13. माही महोत्सव के तहत पूर्व वर्षों में आयोजित नौकायन प्रतियोगिता का दृश्य। 
14. माही महोत्सव के तहत पूर्व वर्षों में आयोजित सांस्कृतिक निशाओं के दृश्य। 



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माही महोत्‍सव की शुभकामनाएं